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विशेष टिप्पणी : आक्षेप का नहीं, गरीबों के आंसू पोंछ रहे हाथों को मजबूत करने का वक्त – डॉ हिमांशु द्विवेदी

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री व भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के ताजा बयान पर 'हरिभूमि-INH 24X7' के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी की विशेष टिप्पणी-

रमन सिंह के बयान में कोई टंकण त्रुटि (टाइपिंग मिस्टेक) तो नहीं हो गई? भारतीय जनता पार्टी और जनसंघ के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकार्ड बना चुके डा. रमन सिंह इन दिनों काफी बैचेन हैं। यह बैचेनी उन्होंने बाकायदा समाचार पत्रों को बयान भेजकर जाहिर भी की है। बैचेनी की वजह उन्होंने हजारों-लाखों मजदूरों की दुर्दशा को बताया है। साथ ही सवाल भी उठाया है कि मजदूरों की इस बदहाली को देखकर भी छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को नींद कैसे आती है? मजदूरों की बदहाली और बेबसी के तमाम दृश्य इस समय समूचे हिंदुस्तान में जहां-तहां दिखाई दे रहे हैं और यह सरकार की नाकामी भी जाहिर कर रहे हैं। लेकिन पूरे देश में दिख रही इस बेबसी, बेचारगी और बर्बादी के सवाल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा जाना चाहिए या भूपेश बघेल से?

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक लाकडाउन के दौर में सर पर गठरी धरे मुर्झाए चेहरों के साथ महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के दृश्य इन दिनों आम हो चुके हैं। इन लोगों की जिंदगी को लेकर तमाम सपने, उम्मीेदें और अरमान धराशायी हो चुके हैं। ना इनके पेट में रोटी है और ना हाथ में रोजी। यातायात के साधनों के अभाव में यह हजारों-लाखों मजदूर अपने गृह प्रदेश लौटने की खातिर सरकारों के दावों से निराश हो अपने पैरों पर भरोसा कर सफर पर निकले हुए हैं। खून के आंसू भी तब सहम जाते हैं जब इन जत्थों में छोटे-छोटे बच्चों को सामान के साथ में गोद में उठाए माएं तो हैं ही, साथ में बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाएं भी मौजूद हैं। जिस सीमेंट मिक्सर मशीन में जानवर भी नहीं ढोए जाते, उन्हें यातायात का साधन समझ 18 मजदूर बैठे इंदौर में पाए जाते हैं। बैलगाड़ी में बैल के साथ इंसान को जुते देखने का ह्रदय विदारक दृश्य भी मध्यप्रदेश में इंदौर के समीप का ही है। भुसावल के समीप रेल की पटरियों पर कटे पड़े थके हारे सोलह मजदूरों के शवों को देश आंसुओं की भी रुलाई फूट पड़ती है।

ऐसे में सवाल ऐसे में सवाल यह है कि पूरे देश में दिखाई दे रही इस बदहाली को देख आंखों से नींद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की ही उड़ना चाहिए या देश के प्रधान सेवक की भी?

सड़कों पर मजदूरों की मौजूदगी संकट से संघर्ष के संकल्प का नतीजा नहीं है। यह नतीजा है कि लगातार लाकडाउन की अवधि बढ़ाते जाने से सर पर छत और पेट में अन्न के अभाव से उपजी विकल्पहीनता का, यह साधनों के अभाव में उठाया गया मजबूरी से भरा कदम है। डा. रमन सिंह ने भूपेश बघेल से जानना चाहा है कि जब उत्तर प्रदेश को उसके मजदूरों को अपने गृह प्रदेश वापिस लाने के लिए 352 श्रमिक ट्रेनें उपलब्ध हो सकती हैं, गुजरात को 236 ट्रेनें उपलब्ध हो सकती हैं तो छत्तीसगढ़ को ट्रेनें क्यों नहीं उपलब्ध हो रहीं। डा. रमन सिंह उस भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं जिसकी केंद्र में सरकार है और वह देशभर में ट्रेनों का संचालन करती है। जो सवाल केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल से पूछा जाना चाहिए, वह राज्य के मुख्यमंत्री से पूछा जा रहा है। जिन दो राज्यों को बेतहाशा ट्रेनें उपलब्ध कराई गई हैं वह भाजपा शासित राज्य हैं। लिहाजा बच्चा भी समझ पा रहा है कि छत्तीसगढ़ गैर भाजपाई सरकार शासित होने की कीमत चुका रहा है।

हद तो यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा बार-बार ट्रेन मांगे जाने के बावजूद उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। ऊपर से रेलमंत्री इन राज्यों को ही जिम्मेदार ठहरा दे रहे हैं। इसी का नतीजा है कि आज भूपेश बघेल ने तथ्यों के साथ रेलमंत्री को ‘झूठा’ करार दे दिया।

सच तो यह है कि कोरोना महामारी के दौर में छत्तीसगढ़ के हालात चौंकाने वाले हैं। देश में जब तकरीबन तीन हजार से ज्यादा लोग मौत के मुंह में समा चुके हैं, उसमें छत्तीसगढ़ से अब तक एक भी नाम नहीं है। क्या इसके लिए भूपेश बघेल बैचेन रहें? या बयासी हजार से ज्यादा कोरोना मरीजों के आंकड़े में छत्तीसगढ़ का योगदान मात्र साठ ही हो पाया है, इसके रहते उन्हें बैचेन रहना चाहिए?

भूपेश बघेल बैचेन हैं लेकिन उनकी बैचेनी की वजह केंद्र सरकार से वह सब-कुछ न मिल पाने को लेकर है जो छत्तीसगढ़ का अधिकार होकर भी उसे नहीं मिल पा रहा है। डा. रमन सिंह की शिकायत है कि ट्रेन के लिए रेलमंत्री से सरकार ने बात क्यों नहीं की? जिन तमाम मसलों पर बात की उसमें क्या हासिल हो गया? किसानों को धान पर बोनस देने के लिए वर्तमान राज्य सरकार अभी भी वचनबद्व है लेकिन वर्ष 2022 तक देश के किसानों की आय दोगुनी करा देने का वादा करने वाली केंद्रीय सरकार इस आपदा के दौर में भी किसान हित में उठाए जाने वाले इस सराहनीय कदम पर सहमति देने के लिए तैयार नहीं है। नतीजा यह है कि राजीव गांधी न्याय योजना के माध्यम से किसानों को राहत पहुंचाने का ‘बैकडोर’ का विकल्प भूपेश सरकार को चुनना पड़ा। अतिरिक्त चावल से ऐथनाल बनाने का राज्य सरकार का प्रस्ताव अभी भी दिल्ली में धूल ही खा रहा है जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों को मंजूरी दी जा चुकी है। छत्तीसगढ़ में सक्रीय तमाम सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के सीएसआर का पैसा प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करा लिया गया, जबकि उस पर नैसर्गिक अधिकार छत्तीसगढ़ प्रदेश का है। इस संबंध में भी राज्य सरकार के अनुरोध पर जवाब अनुत्तरित ही है। कोयले पर अतिरिक्त रायल्टी के चार हजार करोड़ रुपए चार महीने के जीएसटी की बकाया राशि जैसे तमाम मसलों पर भी दिल्ली मौन ही है। तीस हजार करोड़ रुपए के पैकेज की मांग पर भी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। इस खामोशी ने जरूर ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को बैचेन कर रखा है, क्योंकि आपदा के इस दौर में राज्य संसाधन की कमी से जूझ रहा है।

ऐसे कठिन हालात में भी राज्य सरकार की उपलब्धियां अचंभित करती हैं। बढ़ी संख्या में मजदूर गृह राज्य वापिस आ रहे हैं। उनका पुनर्वास अपने आप में चिंता का विषय है। आज का ही आंकड़ा है कि मनरेगा के अंतर्गत तकरीबन पच्चीस लाख लोगों ने काम किया है। अतीत में यह आंकड़ा कभी चौदह लाख से ऊपर नहीं गया। यह सरकार की बढ़ी सफलता है। सीमाओं पर आए अन्य राज्यों के तमाम मजदूरों को उनके राज्य की सीमा तक पहुंचान के लिए बढ़े स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। अकेले राजनांदगांव की सीमा पर दस से पंद्रह हजार मजदूर महाराष्ट्र से आ रहे हैं जिन्हें उड़ीसा बंगाल या झारखंड जाना है। ढाई सौ से ज्यादा बसें एक दिन में लगानी होती हैं जिसका एक दिन का खर्च चालीस से साठ लाख रुपए है। यह मजदूर छत्तीसगढ़ के नहीं हैं लेकिन हैं तो इंसान। मानवता के नाते इन्हें महज भोजन ही नहीं उनके मुकाम तक पहुंचाने में राज्य का शासन-प्रशासन जुटा है। विगत दो माह में सचिवों से लेकर सिपाही तक ने दिन का चैन और रात का आराम महज इसलिए नहीं देखा है क्योंकि उन्होंने चाहा है कि हम सब सुरक्षित रह सकें। यह समय उनकी आलोचना नहीं सराहना का है। तमाम राज्यों की सीमाओं पर यह अफरा-तफरी ना दिखती अगर केंद्र सरकार ने योजनाबद्व तरीके से इन लाखों मजदूरों उनके मुकाम तक भेजने के लिए समय रहते ट्रेनें उपलब्ध करा दी होतीं।

सच तो यह है कि संकट के इस दौर में छत्तीसगढ़ की सभी मोर्चे पर सफलताएं पूरे देश के लिए रोल मॉडल हैं। डा. रमन सिंह और भाजपा केवल एक मुद्दे पर राज्य सरकार को कठघरे में ले सकते हैं और वह है ‘शराब’। वह भी इसलिए क्योंकि शराबबंदी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के घोषणा पत्र का अहं हिस्सा रहा था। अन्यथा कोरोना की महामारी के दौर में डेढ़ माह से बंद शराब दुकानों को लोक डाउन के बावजूद खोलने की अनुमति तो केंद्र सरकार ने ही सभी राज्यों को दी है।

अब भी समय है कि तमाम राजनीतिज्ञ आपदा के इस दौर में सियासी फायदे के आधार पर आरोप-प्रत्यारोप को छोड़ सकारात्मक भूमिका निभाएं। बीस लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज के नाम पर कर्ज की लंबी फेहरिस्त जारी करने से सड़कों पर कीड़े-मकोड़े की तरह नजर आ रहे करोड़ों मजदूरों की जिंदगी में बदलाव तो स्वप्न में भी नहीं हो सकता, यह बैचेनी भूपेश बघेल तो छोड़िए किसी भी संवेदनशील मुनष्य को चैन की नींद नहीं सोने देगी। देश की जनता राहत की उम्मीद सरकार से कर रही है, किसी साहूकार से नहीं, यह मौजूदा निजाम को समझने की जरूरत है।

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