तुतारी बात-बतंगड़

Exclusive : चुनाव आते ही भाजपा को याद आये कार्यकर्ता, सौदान सिंह सहला रहे हैं लुटे-पीटे कार्यकताओं की पीठ…पार्टी पर पूंजीपतियों का कब्जा, हाशिये पर कार्यकर्ता

सौदान सिंह जी, यदि चेहरा जरूरी नहीं है तो वर्षों से पार्टी के लिए खरसिया क्षेत्र में संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओ को किनारे धकेल कर ओपीचौधरी की पैराशूट लैंडिंग क्यों करवायी है ?
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चुनावी वर्ष में प्रवेश करते ही भाजपा पुनः अपनी चौथी पारी की तैयारियों में जुट गयी है। विगत 14 वर्षों के शासन के दौरान भाजपा में कारोबारी नेताओं, कॉर्पोरेट प्रायोजकों व आर्थिक हितधारी अमीर समूहों का एक समानांतर तंत्र काबिज हो गया है। इस गठजोड़ ने आर्थिक संसाधनों का खुलकर उपयोग करते हुये चापलूस पीआरओ, थिंक टैंक और मीडिया संगठनों का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा कर लिया है तथा हर स्तर पर अपने जी हुज़ूरीयों को स्थापित करके पार्टी के भीतर अपनी पकड़ को मजबूत कर लिया है । बड़े नेताओं व अर्थजगत के खिलाड़ियों की इस कार्यशैली से जमीनी भाजपा कार्यकर्ता हाशिये पर चला गया है और बेचैन है । इस बेचैनी को बगावत में तब्दील होने से रोकने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी अनुशासन के नाम पर पार्टी के भीतर पूरी ताकत का केंद्रीकरण कर लिया है । हर चुनाव से पहले इन उपेक्षित कार्यकताओं को क्रमबद्ध ढंग से दिखावटी सम्मान व भावनात्मक बातों का बुस्टर डोज़ दिया जाता है । फिर बड़े ही शातिराना ढंग से इन राजनैतिक गदहों के सामने गाजर लटकाकर इन पर सवारी की जाती है । सत्र 2008 और 2013 में भाजपा कार्यकर्ताओं पर इस ठगी योजना का सफल प्रयोग करने के बाद मिशन 2018 हेतु पुनः इस योजना को लेकर राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री सौदान सिंह प्रदेश में कार्यकर्ताओं की क्लास लगा रहे हैं ।

कार्यकर्ताओं को रिझाने की शातिराना चाल :-

जानकार सूत्र बताते हैं कि इस तरह की क्लास में बार-बार छले जाने से नाराज कार्यकर्ताओं की आत्मतुष्टि हेतु कई तरह के हथकंडों का योजनाबद्ध ढंग से प्रयोग किया जाता है । सूत्रों के अनुसार पहली कड़ी में जिले के सक्षम जनप्रतिनिधियों व बड़े पदाधिकारियों को छोटे कार्यकर्ताओं के समकक्ष बिठाकर उनकी आत्मतुष्टि की जाती है । फिर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा को लेकर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जिले के नेताओं को झिड़की लगायी जाती है । इस पूरे उपक्रम से असंतुष्ट कार्यकर्ता के आहत मन को ठंढा कर लेने के बाद कार्यकर्ताओं के महत्व का गुणगान करते हुए कहा जाता है कि सत्ता की जिस कुर्सी पर बैठकर नेतागण इतरा रहे हैं वह इन कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत व त्याग के परिणाम स्वरूप उन्हें नसीब हुई है ।


कार्यकर्ता पार्टी के रीढ़ की हड्डी है। चेहरा नहीं संगठन चुनाव लड़ता है। हम कार्यकर्ताओं की आंख से देखते हैं और उनके कान से सुनते हैं। वह सत्ता और जनता को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है। भाजपा केवल एक दल नहीं वरन एक वृहत परिवार है। कार्यकर्ता इस परिवार का सम्माननीय सदस्य है। केवल भाजपा में ही पन्ना प्रभारी भी प्रधानमंत्री बन सकता है।
आदि, आदि….

कार्यकर्ता अपनी आला नेताओं से इतनी प्रशंसा सुनकर अपनी समस्त नाराजगी भूल जाता है और अपने महत्वपूर्ण होने के स्वप्नलोक में पहुंच जाता है।
आला नेता समझ जाते हैं कि अब वह आदेश सुनने के लिये तैयार हो चुका है । यहीं से असली खेल शुरू होता है । उन्हें सरकार की उपलब्द्धियाँ बतायी जाती है । यह भी बताया जाता है कि पार्टी की सरकार है इसीलिये पटवारी, मास्टर, पुलिस का सिपाही व सामान्यजन उन्हें नमस्कार करते व सम्मान देते हैं। अतः शिकायती होने की बजाय उन्हें पार्टी का शुक्रगुजार होना चाहिये। अंत में जो चुनावी असफलताएं रह गयी हों, उसके लिए पूरजोर मेहनत करके पुनः सरकार बनाने का संकल्प दिलवाया जाता है।

सार बात यह है कि भाजपा कार्यकर्ताओं को पुनः एक बार रिझाने व चुनावी उपयोग हेतु उन्हें झोंकने की तैयारियों में लग गयी है । देखना यह है कि विपक्ष में रहते हुये अपनी संघर्ष क्षमता से सत्ता की नींव हिला देने वाले भाजपा के लड़ाके 14 वर्षों से लगातार ठगे जाने के बावजूद फिर से एक बार आलकामान की शातिराना चाल के झांसे में आते हैं अथवा पहले 14 वर्षों के शोषण का हिसाब मांगते हैं ।

लेखक रायगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश मिश्र हैं, ये लेखक के खुद के निजी विचार है |

 

 

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